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Shambhudhan Phunglo: Difference between revisions

From National War Memorial
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शंभुधन फंगलो का जन्म 1850 में लंकर माइवांग (असम) में देपेन्द्राओ फुंगलो के पुत्र के रूप में हुआ था। असम नागा हिल्स के क्षेत्र में अंग्रेजों ने 'फूट डालो और शासन करो' की नीति से डिमासा और कछारी राज्यों को छिन्न-भिन्न कर दिया। अंग्रेजों की इस नीति ने शंभुधन फुंगलो को अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ने को बाध्य कर दिया। वह लम्बे कान तथा काली आँखों वाला लम्बे कद का पाठा जवान था। शिव भक्त भी था। उसने अनेक क्षेत्रों का भ्रमण करके 20 - 20 युवाओं को संगठनों में विभक्त कर दिया। माई बांग में रणचण्डी मंदिर के निकट क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित कर दिया। 1942 के 'अंग्रेजो ! भारत छोड़ो' आन्दोलन से 60 वर्ष पूर्व ही 1882 में शंभुधन ने घोषणा कर दी- "अरे ओ सफेद चमड़ी वाले बुलबुलो... हमारे देश की पवित्र मिट्टी का अविलम्ब परित्याग कर दो....." अंग्रेजों को गुप्तचरों से शंभुधन की गतिविधियों का पता चल गया। उसे गिरफ्तार करने हेतु छः सिपाही भेजे गये। लेकिन उसके नाम से ही शत्रुओं में इतनी घबराहट थी कि सिपाही उसे गिरफ्तार किये बिना मार्ग से ही वापस लौट गये। इसका परिणाम यह हुआ कि शंभुधन ने अपनी किलेबंदी और अधिक मजबूत कर ली। मेजर बोयाड ने उसके शिविरों पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में मेजर बोयाड मारा गया। अंग्रेज सेना ने भाग कर जान बचाई। शंभुधन ने बराक नदी के किनारे सिद्धेश्वर मंदिर, हारंगाजाओ की शिव बाडी, काराकारी की शिव बाड़ी, हाइला कांदी का देवी मंदिर आदि मंदिरों में अपने युद्ध शिविर स्थापित किये हुए थे। एक बार ब्रिटिश सैनिकों ने इग्रालिंग में विश्राम करते हुए उसे घेर लिया। पारम्परिक स्रोतों से उपलब्ध जानकारी के अनुसार 13 जनवरी, 1883 को वीर शंभुधन फुंगलो ब्रिटिश सैनिकों से जूझते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
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Revision as of 13:05, 21 December 2025

शंभुधन फंगलो का जन्म 1850 में लंकर माइवांग (असम) में देपेन्द्राओ फुंगलो के पुत्र के रूप में हुआ था। असम नागा हिल्स के क्षेत्र में अंग्रेजों ने 'फूट डालो और शासन करो' की नीति से डिमासा और कछारी राज्यों को छिन्न-भिन्न कर दिया। अंग्रेजों की इस नीति ने शंभुधन फुंगलो को अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ने को बाध्य कर दिया। वह लम्बे कान तथा काली आँखों वाला लम्बे कद का पाठा जवान था। शिव भक्त भी था। उसने अनेक क्षेत्रों का भ्रमण करके 20 - 20 युवाओं को संगठनों में विभक्त कर दिया। माई बांग में रणचण्डी मंदिर के निकट क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित कर दिया। 1942 के 'अंग्रेजो ! भारत छोड़ो' आन्दोलन से 60 वर्ष पूर्व ही 1882 में शंभुधन ने घोषणा कर दी- "अरे ओ सफेद चमड़ी वाले बुलबुलो... हमारे देश की पवित्र मिट्टी का अविलम्ब परित्याग कर दो....." अंग्रेजों को गुप्तचरों से शंभुधन की गतिविधियों का पता चल गया। उसे गिरफ्तार करने हेतु छः सिपाही भेजे गये। लेकिन उसके नाम से ही शत्रुओं में इतनी घबराहट थी कि सिपाही उसे गिरफ्तार किये बिना मार्ग से ही वापस लौट गये। इसका परिणाम यह हुआ कि शंभुधन ने अपनी किलेबंदी और अधिक मजबूत कर ली। मेजर बोयाड ने उसके शिविरों पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में मेजर बोयाड मारा गया। अंग्रेज सेना ने भाग कर जान बचाई। शंभुधन ने बराक नदी के किनारे सिद्धेश्वर मंदिर, हारंगाजाओ की शिव बाडी, काराकारी की शिव बाड़ी, हाइला कांदी का देवी मंदिर आदि मंदिरों में अपने युद्ध शिविर स्थापित किये हुए थे। एक बार ब्रिटिश सैनिकों ने इग्रालिंग में विश्राम करते हुए उसे घेर लिया। पारम्परिक स्रोतों से उपलब्ध जानकारी के अनुसार 13 जनवरी, 1883 को वीर शंभुधन फुंगलो ब्रिटिश सैनिकों से जूझते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।