Somnath Sharma: Difference between revisions
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'''His last message''', transmitted under fire, epitomized his resolve: | '''His last message''', transmitted under fire, epitomized his resolve: | ||
''“The enemy is only 50 yards from us. We are heavily outnumbered. We are under devastating fire. I shall not withdraw an inch but will fight to the last man and the last round.”'' | ''“The enemy is only 50 yards from us. We are heavily outnumbered. We are under devastating fire. I shall not withdraw an inch but will fight to the last man and the last round.”'' | ||
[[File:Maj Somnath02.webp|center|thumb|950x950px|''"The enemy is only 50 yards from us. We are heavily outnumbered. We are under devastating fire. I shall not withdraw an inch but will fight to the last man and the last round." - Major Somnath Sharma, India's First Param Vir Chakra'']] | |||
=== Impact and Outcome === | === Impact and Outcome === | ||
[[File:Maj Somnath03.webp|thumb|468x468px|Major Somnath Sharma]] | |||
Inspired by his example, the company held on for '''six crucial hours''', inflicting heavy losses and '''delaying the enemy’s advance''', thereby enabling reinforcements to secure approaches to Srinagar. Though D Company suffered grievous casualties, the action decisively '''bought time''' and altered the operational situation in India’s favour. Military historians regard this stand as pivotal in preventing the fall of Srinagar. | Inspired by his example, the company held on for '''six crucial hours''', inflicting heavy losses and '''delaying the enemy’s advance''', thereby enabling reinforcements to secure approaches to Srinagar. Though D Company suffered grievous casualties, the action decisively '''bought time''' and altered the operational situation in India’s favour. Military historians regard this stand as pivotal in preventing the fall of Srinagar. | ||
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=== Service Details (At a Glance) === | === Service Details (At a Glance) === | ||
* '''Service Number:''' IC-521 | * [[File:Maj Somnath04.webp|thumb|Indian troops landing at the Srinagar airport on October 27, 1947]]'''Service Number:''' IC-521 | ||
* '''Rank:''' Major | * '''Rank:''' Major | ||
* '''Unit:''' 4 Kumaon | * '''Unit:''' 4 Kumaon | ||
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On '''nationalwarmemorial.org''', Major Somnath Sharma’s profile stands as a '''permanent digital memorial'''—a testament to India’s first Param Vir Chakra hero, whose sacrifice secured the nation’s frontier at a defining hour and whose example continues to inspire generations of soldiers and citizens alike. | On '''nationalwarmemorial.org''', Major Somnath Sharma’s profile stands as a '''permanent digital memorial'''—a testament to India’s first Param Vir Chakra hero, whose sacrifice secured the nation’s frontier at a defining hour and whose example continues to inspire generations of soldiers and citizens alike. | ||
== '''मेजर''' '''श्री''' '''सोमनाथ शर्मा''' == | |||
'''भारत के प्रथम परमवीर चक्र विजेता | बदगाम के रणनायक''' | |||
मेजर श्री सोमनाथ शर्मा भारतीय सैन्य इतिहास के उन अमर नामों में से हैं, जिनकी वीरता, नेतृत्व और बलिदान ने स्वतंत्र भारत की रक्षा की नींव को दृढ़ किया। वे '''भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता''' थे। 3 नवम्बर 1947 को '''बदगाम (कश्मीर)''' की लड़ाई में उन्होंने अत्यंत विषम परिस्थितियों में अपने प्राणों का उत्सर्ग करते हुए श्रीनगर और उसके हवाई अड्डे की रक्षा की—और इतिहास में अमर हो गए। | |||
=== जन्म, परिवार और संस्कार === | |||
मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म '''31 जनवरी 1923''' को '''दाध, कांगड़ा (वर्तमान हिमाचल प्रदेश)''' में हुआ। वे एक प्रतिष्ठित सैन्य परिवार से थे। उनके पिता '''मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा''' भारतीय सेना में वरिष्ठ अधिकारी रहे। परिवार की सैन्य परंपरा ने उनके व्यक्तित्व में अनुशासन, साहस और राष्ट्रभक्ति का संस्कार बचपन से ही भर दिया। उनके भाई-बहन भी सेना और चिकित्सा सेवाओं में उच्च पदों पर रहे—जो इस परिवार की राष्ट्रसेवा की परंपरा को दर्शाता है। | |||
=== शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण === | |||
प्रारंभिक शिक्षा '''शेरवुड कॉलेज, नैनीताल''' में हुई। इसके बाद उन्होंने '''प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल मिलिट्री कॉलेज, देहरादून''' तथा आगे चलकर '''रॉयल मिलिट्री कॉलेज, सैंडहर्स्ट (यूके)''' में प्रशिक्षण प्राप्त किया। | |||
'''22 फरवरी 1942''' को उन्हें '''8वीं बटालियन, 19 हैदराबाद रेजिमेंट''' (जो आगे चलकर '''4 कुमाऊँ रेजिमेंट''' बनी) में कमीशन प्राप्त हुआ। | |||
[[File:Maj Somnath05.webp|thumb|450x450px|Major Somnath Sharma (centre) ]] | |||
=== द्वितीय विश्व युद्ध का अनुभव === | |||
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने '''बर्मा (अराकान अभियान)''' में सक्रिय भूमिका निभाई। युद्ध क्षेत्र में साहसिक और कुशल नेतृत्व के लिए उन्हें '''‘मेंशन-इन-डिस्पैचेज़’''' से सम्मानित किया गया। यह अनुभव आगे चलकर 1947–48 के युद्ध में उनके नेतृत्व का आधार बना। | |||
=== 1947–48 का भारत–पाक युद्ध और बदगाम की लड़ाई === | |||
भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर पर कबायली आक्रमणकारियों का हमला हुआ। श्रीनगर और उसके हवाई अड्डे की सुरक्षा अत्यंत निर्णायक थी। | |||
'''31 अक्टूबर 1947''' को मेजर सोमनाथ शर्मा की कंपनी को कश्मीर एयरलिफ्ट किया गया। उस समय उनका '''बायाँ हाथ प्लास्टर में था''' (हॉकी खेलते समय फ्रैक्चर), फिर भी उन्होंने आराम लेने से इनकार किया और स्वयं मोर्चे पर डटे रहे। | |||
'''3 नवम्बर 1947''', बदगाम— | |||
मेजर शर्मा की कंपनी में लगभग '''50 सैनिक''' थे, जबकि सामने से '''लगभग 500 सशस्त्र कबायली हमलावर''', मोर्टार समर्थन के साथ, तीन दिशाओं से टूट पड़े। स्थिति अत्यंत विषम थी। उन्होंने तत्काल सहायता का संदेश भेजा, परंतु जब तक मदद पहुँचे, तब तक मोर्चा थामे रखना अनिवार्य था। | |||
=== अद्वितीय नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान === | |||
मेजर शर्मा लगातार खुले मैदान में दौड़-दौड़कर अपने जवानों का उत्साह बढ़ाते रहे, शत्रु की तीव्र गोलीबारी के बीच '''खुद खड़े होकर फायर निर्देशित करते रहे'''। हताहतों के कारण जब मशीनगनों की मारक क्षमता घटी, तो '''प्लास्टर लगे हाथ के बावजूद स्वयं मैगज़ीन भरकर''' गनरों को देते रहे। | |||
उन्होंने शत्रु की निगाहों के सामने '''कपड़े के पट्टे बिछाकर भारतीय वायुसेना के विमानों को लक्ष्य संकेत''' दिए। | |||
एक मोर्टार गोला गोला-बारूद के बीच आ गिरा और विस्फोट में वे वीरगति को प्राप्त हुए। | |||
उनके '''अंतिम शब्द''' आज भी भारतीय सैन्य इतिहास का अमर वाक्य हैं:<blockquote>''“दुश्मन हमसे केवल 50 गज दूर है। हम भारी संख्या में घिरे हैं और भीषण गोलाबारी हो रही है। मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूँगा—आख़िरी आदमी और आख़िरी गोली तक लड़ूँगा।”''</blockquote> | |||
=== रणनीतिक परिणाम === | |||
मेजर शर्मा के नेतृत्व और बलिदान से उनकी कंपनी ने '''लगभग छह घंटे तक दुश्मन को रोके रखा'''। इस विलंब ने भारतीय सेना को श्रीनगर की रक्षा के लिए आवश्यक '''महत्वपूर्ण समय''' दिया। जब तक सहायता पहुँची, तब तक उनका उद्देश्य पूरा हो चुका था—'''श्रीनगर बच चुका था'''। | |||
=== परमवीर चक्र === | |||
उनकी असाधारण वीरता, नेतृत्व और आत्मोत्सर्ग के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा को '''परमवीर चक्र (मरणोपरांत)''' से सम्मानित किया गया। वे '''इस सर्वोच्च वीरता अलंकरण के पहले प्राप्तकर्ता''' बने। उनका उदाहरण भारतीय सेना के इतिहास में साहस और कर्तव्यनिष्ठा की सर्वोच्च मिसाल है। | |||
=== स्मृति और विरासत === | |||
* '''राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, नई दिल्ली''' में उनकी प्रतिमा | |||
* '''श्रीनगर एयरपोर्ट''' स्थित मेजर सोमनाथ शर्मा स्मारक | |||
* '''रानीखेत''' में उनके नाम पर सेना मैदान | |||
* सड़कों, पार्कों और आवासीय परिसरों का नामकरण | |||
* '''डाक टिकट और प्रथम दिवस आवरण''' जारी | |||
मेजर सोमनाथ शर्मा केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि '''कर्तव्य, साहस और बलिदान की जीवंत परिभाषा''' हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्र की रक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि '''अडिग संकल्प और नेतृत्व''' से होती है। | |||
'''राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और राष्ट्रीय स्मृति में उनका नाम सदा अमर रहेगा।''' | |||
[[File:Maj Somnath06.webp|center|thumb|939x939px|Major Somnath Sharma's PVC Citation ]] | |||
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