Ramaswamy Parameswaran
मेजर श्री रामास्वामी परमेश्वरन, पीवीसी (बलिदानोपरांत)
Ramaswamy Parameswaran, PVC (13 September 1946, Mumbai – 25 November 1987, Sri Lanka) was an Indian military officer who was awarded the Param Vir Chakra, India's highest military decoration, for his bravery during the Sri Lankan Civil War.

Career
Major Parameshwaran was born in a Tamil Brahmin family and he was granted a Short Service Commission as a second lieutenant in the 15th Battalion Mahar Regiment on 16 January 1972.Promoted lieutenant on 16 January 1974, he was subsequently granted a regular commission, and was promoted captain on 12 October 1979 and to major on 31 July 1984.
Military action
On 25 November 1987, when Major Ramaswamy Parameswaran was returning from search operation in Sri Lanka, late at night, his column was ambushed by a group of militants which had five rifles. With a cool presence of mind, he encircled the militants from the rear and charged into them, taking them completely by surprise. During the hand-to-hand combat, a militant shot him in the chest. Undaunted, Major Parameswaran snatched the rifle from the militant and shot him dead. Gravely wounded, he continued to give orders and inspired his command till he died. Five militants were killed and three rifles and two rocket launchers were recovered and the ambush was cleared .
Param Vir Chakra citation
The Param Vir Chakra citation on the Official Indian Army Website reads as follows:
CITATION
MAJOR RAMASWAMY PARAMESWARAN
8 MAHAR (IC-32907)
On 25 November 1987, when Major Ramaswamy Parameswaran was returning from search operation in Sri Lanka, late at night, his column was ambushed by a group of militants. With cool presence of mind, he encircled the militants from the rear and charged into them, taking them completely surprise. During the hand-to-hand combat, a militant shot him in the chest. Undaunted, Major Parameswaran snatched the rifle from the militant and shot him dead. Gravely wounded, he continued to give orders and inspired his command till he breathed his last. Five militants were killed and three rifles and two rocket launchers were recovered and the ambush was cleared.
Major Ramaswamy Parameswaran displayed the most conspicuous gallantry and thought nothing of dying at his post.
Naming of an apartment
The Army Welfare Housing Organization (AWHO) built a colony in Arcot Road Chennai and named it as A.W.H.O Parameshwaran Vihar in the year 1998 in honor of Major Ramaswamy Parameswaran.

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन , परमवीर चक्र (बलिदानोपरांत)
8 महार रेजिमेंट | भारतीय सेना

ऑपरेशन पवन (श्रीलंका) के अमर नायक
मेजर रामास्वामी परमेश्वरन भारतीय सेना के उन असाधारण योद्धाओं में हैं, जिन्होंने राष्ट्रहित में विदेशी धरती पर भी सर्वोच्च शौर्य और आत्मोत्सर्ग का परिचय दिया। 25 नवंबर 1987 को श्रीलंका में ऑपरेशन पवन के दौरान, अत्यंत जोखिमपूर्ण मुठभेड़ में उन्होंने निर्भीक नेतृत्व, शीतल साहस और अदम्य युद्ध-आत्मा का प्रदर्शन करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। इसी अद्वितीय वीरता के लिए उन्हें परमवीर चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। वे ऑपरेशन पवन के एकमात्र परमवीर चक्र विजेता और ओटीए चेन्नई से निकले पहले पीवीसी हैं।
प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
मेजर रामास्वामी परमेश्वरन का जन्म 13 सितंबर 1946 को बॉम्बे (अब मुंबई), महाराष्ट्र में श्री के. एस. रामास्वामी और श्रीमती जानकी रामास्वामी के यहाँ हुआ। उन्होंने एस.आई.ई.एस. हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा तथा एस.आई.ई.एस. कॉलेज से विज्ञान में स्नातक किया।
सैन्य जीवन के प्रति आकर्षण उन्हें ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (ओटीए), चेन्नई ले गया, जहाँ से वे 16 जनवरी 1972 को भारतीय सेना में कमीशंड हुए।
सैन्य सेवा एवं नेतृत्व
कमीशन के बाद उनकी तैनाती 15 महार में हुई और आगे चलकर वे 5 महार के साथ उत्तर–पूर्व भारत में उग्रवाद-रोधी अभियानों में सक्रिय रहे। इन अभियानों के दौरान वे दृढ़ संकल्प, अनुकरणीय नेतृत्व और क्षेत्र-प्रभुत्व के लिए प्रसिद्ध हुए। सैनिक उन्हें स्नेहपूर्वक “पैरी साहब” कहते थे—कठिनतम गश्तों और जोखिमभरे कार्यों में वे स्वयं अग्रिम पंक्ति में रहते, जबकि स्थानीय नागरिकों के साथ उनका व्यवहार सदैव मानवीय और संवेदनशील रहा।
ऑपरेशन पवन: पृष्ठभूमि
29 जुलाई 1987 को हुए भारत–श्रीलंका समझौते के बाद, श्रीलंका में शांति स्थापना हेतु भारतीय शांति सेना (IPKF) तैनात की गई—यह स्वतंत्र भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय शांति-स्थापन मिशन था। 8 महार, 91 इन्फैंट्री ब्रिगेड के अंतर्गत, सबसे पहले तैनात होने वाली इकाइयों में थी। LTTE के सशस्त्र प्रतिरोध के चलते अभियान शीघ्र ही भीषण संघर्ष में बदल गया।
25 नवंबर 1987: कंटराडाई (कांतरोडई) की वीरगाथा
25 नवंबर 1987 की तड़के, कांतरोडई क्षेत्र में एक तलाशी–अभियान के बाद लौटते समय मेजर परमेश्वरन के स्तंभ पर आतंकी घात लगा दी गई।
- स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए उन्होंने ठंडे दिमाग से शत्रु को पीछे से घेरने का निर्णय लिया।
- हाथों-हाथ की लड़ाई में एक आतंकी ने उन्हें सीने में गोली मार दी; फिर भी वे विचलित नहीं हुए।
- उन्होंने हमलावर से राइफल छीनकर उसे वहीं ढेर किया और घात को तोड़ते हुए अपने सैनिकों का नेतृत्व जारी रखा।
- गंभीर रूप से घायल अवस्था में भी वे अंतिम क्षण तक आदेश देते और प्रेरित करते रहे।
- मुठभेड़ में 5–6 आतंकी मारे गए, AK-47 राइफलें और रॉकेट लॉन्चर बरामद हुए; शत्रु जंगल की ओर भागा और क्षेत्र सुरक्षित हुआ।
इस संघर्ष में उन्होंने कर्तव्य से परे जाकर अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
परमवीर चक्र
असाधारण शौर्य, अदम्य युद्ध-आत्मा और सर्वोच्च बलिदान के लिए मेजर रामास्वामी परमेश्वरन को परमवीर चक्र (मरणोपरांत) प्रदान किया गया। उनका पराक्रम भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपराओं का प्रतीक है।
स्मारक, सम्मान एवं विरासत
- राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, नई दिल्ली के परम योद्धा स्थल पर उनकी बस्ट।
- ओटीए, चेन्नई में उनका स्मारक।
- अंडमान–निकोबार के एक द्वीप का नामकरण उनके सम्मान में (पराक्रम दिवस, 2023)।
- AWHO परमेश्वरन विहार, चेन्नई—आवासीय कॉलोनी उनके नाम पर।
- सैन्य साहित्य, कॉमिक्स और वृत्तचित्रों में उनकी प्रेरक गाथा।
मेजर रामास्वामी परमेश्वरन का जीवन यह सिद्ध करता है कि नेतृत्व संकट में जन्म लेता है—जहाँ कमांडर स्वयं आगे बढ़कर उदाहरण प्रस्तुत करता है। विदेशी धरती पर भी राष्ट्रध्वज की प्रतिष्ठा की रक्षा करते हुए दिया गया उनका बलिदान, आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, कर्तव्य और मानवीय मूल्यों का अमर मानक है।

